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सेवा भारती के केंद्रों पर पीली आभा के साथ गूंजा सरस्वती वंदना का स्वर
- 2026-02-06 01:38:47
ऋतुराज बसंत के आगमन और ज्ञान, कला एवं संगीत की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती के प्राकट्य उत्सव 'बसंत पंचमी' को आज सेवा भारती के सभी सेवा केंद्रों पर अत्यंत गरिमामय ढंग से मनाया गया। "सेवा परमो धर्म:" के ध्येय वाक्य को चरितार्थ करने वाली संस्था सेवा भारती ने इस आयोजन के माध्यम से न केवल बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ा, बल्कि उनमें 'शिक्षा और सेवा' के अटूट संबंध को भी पुख्ता किया।
बसंत के प्रतीक पीले रंग के परिधानों में सजे नन्हे-मुन्ने बच्चों ने पूरे वातावरण को उत्साह से भर दिया। केंद्रों को गेंदे के फूलों और रंगोली से सजाया गया था। मंत्रोच्चार के बीच माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ हुआ।
संस्कार और शिक्षा का संगम
सेवा भारती के पदाधिकारियों ने बच्चों को संबोधित करते हुए बसंत पंचमी का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व समझाया। वक्ताओं ने कहा कि:
1. ज्ञान ही शक्ति है: शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि वह बोध है जो हमें समाज के लिए उपयोगी बनाए।
2. सांस्कृतिक जड़ें: ऐसे पर्व बच्चों को अपनी गौरवशाली विरासत और महान ऋषियों की परंपरा से जोड़ते हैं।
3. सेवा भाव: ज्ञान वही सार्थक है जो दूसरों के कष्ट हरने और समाज की सेवा में काम आए।
आयोजन के दौरान बच्चों ने उत्साहपूर्वक सरस्वती वंदना, भजन और प्रेरणादायी गीतों की प्रस्तुतियाँ दीं। कई केंद्रों पर बच्चों के लिए चित्रकला प्रतियोगिता भी आयोजित की गई, जिसका विषय 'प्रकृति और बसंत' रखा गया। बच्चों की मासूमियत और उनकी कलात्मक प्रतिभा को देखकर वहां उपस्थित अभिभावक और सेवाभावी कार्यकर्ता भावविभोर हो उठे।
कार्यक्रम के अंत में सभी को पीले चावल और केसरिया हलवे का प्रसाद वितरित किया गया। बच्चों और सेवाभावी कार्यकर्ताओं ने मिलकर यह संकल्प लिया कि वे अपनी शिक्षा का उपयोग राष्ट्र के उत्थान और दीन-दुखियों की सेवा में करेंगे। यह आयोजन समाज के अंतिम छोर पर खड़े बच्चों के जीवन में नई ऊर्जा और उमंग भरने का एक सफल प्रयास सिद्ध हुआ।

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